इतिहास की सबसे महानतम लड़ाई में से एक 21 सिखों द्वारा 10000 अफगानी ओं के छक्के छुड़ा देने की कहानी

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इतिहास की सबसे महानतम लड़ाईयों में से एक है जिसको हम सारागढ़ी के युद्ध के नाम से जानते हैं।
सारागढ़ी नामक स्थान ब्रिटिश भारत के उत्तर पश्चिम फ्रंटियर प्रांत में था, जो कि अब पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में पड़ता है।
सारागढ़ी सामना रेंज पर स्थित कोहाट जिले का एक सीमावर्ती छोटा सा कस्बा है जो कि पाकिस्तान में है, इस किले को  20 अप्रैल 1894 को ब्रिटिश भारतीय के 36 वी सिख रेजीमेंट के कर्नल जे कुक की कमान में बनाया गया था। अगस्त 1897 में लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन हैटन की कमान में 36 वी  सिख रेजीमेंट की पांच कंपनियों को ब्रिटिश इंडिया के उत्तर-पश्चिम सीमा में भेजा गया था और सामना हिल्स साहटप घर  कोरांग सारागिरी में उनकी तैनाती की गई।
अंग्रेजी सरकार यहां पर हमेशा अस्थिर रही, अशांत क्षेत्र को कुछ समय के लिए तो शांत कर पाई, पर वहां के जो मूल निवासी पश्तून अफरीदी पठानी थे  उन्होंने समय समय पर ब्रिटिश सैनिकों पर हमला करना जारी रखा।
इसके लिए ब्रिटिश राज में किलों की एक संखला को मरम्मत करके अपनी स्थिति मजबूत करना चाहिए।
यह वही के क़िले थे जो मूल रूप से सिख साम्राज्य के शासक महाराजा रंजीत  सिंह द्वारा बनवाए गए थे।
इनमें से 2 किले लॉकहार्ट जो (कि हिंदूकुश पहाड़ियों की सामना रेंज) में और फोर्ट गुलिस्तान  (सुलेमान रेंज)ऐसे
थे, जो एक दूसरे से कुछ मील की दूरी पर स्थित थे।

इन क़िलों को एक दूसरे से नहीं दिखाई देने के कारण सारागढ़ी को इनके मध्य बनाया गया था सारागढ़ी पोस्ट को एक चट्टानी पहाड़ी की चोटी पर बनाया गया था जिसमें एक छोटा सा हाउस था किले की मजबूत दीवार थीं,और सिगनल टावर का निर्माण किया गया था।

विद्रोह अफ़गानों द्वारा
सन 1897 में अफगानी सेना के द्वारा विद्रोह शुरू हुआ और 27 अगस्त से 11 सितंबर के बीच पश्तून पठानों द्वारा किलो को कब्जा करने की नई योजना का जोरदार प्रयास हुआ इस समय वहां पर 36 वी सिख रेजीमेंट तैनात थी जिसने उनकेे सभी प्रयासों को विफल कर दिया।
कुछ महीनों के बाद विद्रोह और बढ़ता गया तथा 3 और 9 सितंबर के मध्य अफरीदी और अफ़ग़ानों ने मिलकर हमला किया।
इन दोनों का नेतृत्व गुल बादशाहा कर रहा था

गुरमीत सिंह के अनुसार लोकहर्ट किले  के लिए में कैप्टन को सूचना मिली कि उन पर हमला हुआ हैं
 कर्नल हैटन के अनुसार वह वहाँ  तुरंत सहायता नहीं भेज सकते थे।  क्योंकि सेना को पेशावर से आना था।
 दुश्मनों ने किले की दीवार के एक भाग को तोड़ दिया।
कर्नल कैप्टन ने संकेत दिया कि उनके अनुमान के अनुसार सारागढ़ी पर 10000 से 15000 अफ़ग़ानों ने हमला किया है
मुख्य द्वार खोलने के लिए दो बार प्रयास किया लेकिन असफल रहा उसके बाद दीवार टूट गई।
बाद में आमने-सामने की भयंकर लड़ाई हुई असाधारण बहादुरी दिखाते हुए ईश्वर सिंह जो कि हवलदार थे (36 वी  सिख रेजीमेंट बटालियन के)  अपने सैनिकों को पीछे की तरफ हटने का आदेश दिया।
 जिससे लड़ाई को जारी रखा जा सके हालांकि इसमें बाकी सभी सैनिक अंदर की तरफ चले गए लेकिन एक प्रस्ताव के साथ एक सैनिक मारा गया।
कहा जाता है कि इसमें एक सैनिक रसोईया भी था।
 गुरुमुख सिंह जो कर्नल के साथ युद्ध समाचारों से अवगत करवा रहे थे अंतिम रछक थे ऐसा माना जाता है कि उन्होंने 20 अफगान सैनिकों को मारा।
उन्होंने अफगान सेना की नाक में दम कर रखा था जिससे परेशान होकर अफ़गानों ने उनको मारने के लिए आग के गोलों से हमला किया उन्होंने मरते दम तक लगातार
जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल  का नारा लगाते रहे।
अंत में अफगानी युद्ध में विजय हुए इस युद्ध में 21 सिखों द्वारा लगभग 450 अफगानी मारे गए थे हालांकि अफगानी दावा 180 का ही है, पर भारतीय ब्रिटिश सरकार दाबा है कि  युद्ध में  450 अफ़गानी मरे गए थे।
सारागढ़ी दिवस
सारागारी  दिवस एक सिख सैन्य दिवस  रूप में मनाया जाता है  जो हर साल 12 सितंबर को सारागढ़ी की लड़ाई की याद में मनाया जाता है
हर भारतीय नागरिक 12 सितंबर को दुनिया भर में सरागारी की लड़ाई की याद करते हैं
 जिसने  इतिहास में बहादुरी का एक  कीर्तिमान स्थापित किया
 सिख रेजीमेंट की सभी टुकड़िया हर वर्ष  सारागढ़ी दिवस को रेजिमेंटल बैटल ऑनर्स डे के रूप में मनाती  हैं विदेशों में भी भारतीय खासकर सिखों द्वारा सारागढ़ी दिवस बड़े धूमधाम से मनाया जाता है अंग्रेजों ने भी सारागढ़ी की याद में दो गुरुद्वारों का निर्माण कराया था!

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