वीर सावरकर देशभक्त या देश तोड़ने वाले?

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वीर सावरकर (विनायक दामोदर सावरकर) भारतीय राजनीति में विभिन्न दलों के बीच वैचारिक मतभेदों का केंद्र रहा है।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी व्यक्ति नेता और हिंदू राष्ट्र की वैचारिक विचारधारा को समर्थन और प्रतिपादन करने वाले वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को भागूर नासिक में  हुआ था।
इन्होंने City Law School से प्रारम्भिक  शिक्षा प्राप्त की 1902 में fergusson कॉलेज पुणे से बाद  Mumbai University से पढ़ाई की।
 इनकी पत्नी का नाम यमुनाबाई था। अखिल भारतीय हिंदू महासभा के कद्दावर नेता थे इनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें हिंदुत्व वॉर ऑफ इंडियन इंडीपेंडेंस, Hindu rashtra Darshan आदि हैं।
स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर का जीवन भारत में एक  ऐसे व्यक्ति का जीवन है जिन से कई विवाद जुड़े हुए हैं।
जहां भारतीय जनता पार्टी उन्हें स्वतंत्रता सेनानी परम राष्ट्रभक्त और समाज सुधारक मानती है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस समेत  समस्त विरोधी उन्हें देश विरोधी साबित करने के तर्क देती रहती है। जिन 3 मुद्दों को लेकर विरोधी दल हमेशा बीजेपी पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं, उनमें एक सावरकर का माफीनामा है जो उन्होंने अंग्रेजी सरकार को बार-बार लिखे थे जब अंडमान की celluler जेल में कैद थे। दूसरा एक सावरकर ने अपनी किताब में लिखा था कि गाय का पालन होना चाहिए उसकी पूजा नहीं क्योंकि गाय पशु है।
उन्होंने अपनी किताब में लिखा की भगवान् के बाद इस पृथ्वी पर मनुष्य का नंबर आता है और फिर पशुओ का।
और तीसरा की वह देश को विभाजन की और ले गए।
उनकी टू नेशन थिअरी के बाद ही जिन्ना की विचारधारा को ज्यादा बल मिला  जो क़ि देश के विभाजन का  एक बड़ा कारण बने।
आज कांग्रेस पार्टी जिस सावरकर को लेकर बीजेपी पर इतना हमलावर रहती है, कभी वह भी सावरकर की बड़ी मुरीद हुआ करती थी। इसकी बानगी हमें देखने को तब मिलती है जब इंदिरा गांधी ने 1970 में सावरकर के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था। उस समय इंदिरा गांधी ने मुंबई में वीर सावरकर के स्मारक के लिए 11000 के सहयोग की राशि भी प्रदान की थी यही नहीं Congress Party ने वीर सावरकर को एक क्रांतिकारी  देशभक्त बताया था।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई पुणे में एक वीर सावरकर पर आयोजित समारोह में कहा था, "सावरकर एक व्यक्ति नहीं, बल्कि विचार है 'चिंगारी नहीं बल्कि अंगार हैं ' सीमित नहीं विस्तार हैं" इस प्रकार उन्होंने कहा था कि वीर सावरकर हमेशा एक बहुरंगी व्यक्तित्व के लिए याद किए जाएंगे।
वर्ष 2000 में अटल बिहारी वाजपेई सरकार ने तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायण के पास वीर सावरकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न के लिए भेजा था लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति ने स्वीकार नहीं किया।
वीर सावरकर लंदन के लॉ कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे उसी समय उन्होंने इंडिया हाउस में रहना शुरू कर दिया। उस समय इंडिया हॉउस भारतीय क्रांतिकारियों के लिए राजनीतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र था। जिस का संचालन पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी कर रहे थे। सावरकर में "फ्री इंडिया सोसायटी" का निर्माण किया जिसमें वह अपने भारतीय क्रांतिकारी योद्धाओं के साथ स्वतंत्रता के लिए चर्चा करते थे।
सावरकर 1857 की लड़ाई को भारत का अंग्रेजों के विरुद्ध पहला स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई करार दी। उनकी प्रमुख किताबों में से एक "द हिस्ट्री ऑफ द गॉड ऑफ इंडियन इंडिपेंडेंस" नामक पुस्तक में काफी विस्तार से गहन अध्ययन किया गया है कि किस तरह अंग्रेजों को जड़ से उखाड़ आ जा सकता है।
1 जुलाई 1909 मदन लाल ढींगरा द्वारा विलियम हॉट वर्जन को गोली मारेे जाने के बाद वीर सावरकर ने लंदन टाइम्स में एक लेख लिखा। इसके बाद 13 मई 1910 को लंदन  में गिरफ्तार किया गया।
परंतु 7 जुलाई 1910 को एसएस मोरिया नामक जहाज से सावरकर रास्ते में भाग निकले।
दिसंबर 1910 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई। इसके बाद 31 जनवरी 1911 को उन्हें दोबारा आजीवन कारावास दिया गया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने वीर सावरकर को अपने देश के लिए किए गए क्रांतिकारी कार्यों के लिए दो दो बार आजन्म कारावास की सजा सुनाई जो विश्व के इतिहास में पहली एवं अनोखी सजा थी। सावरकर ने कहा था कि
"मातृभूमि तेरे चरणों में पहले ही मैं अपना मन अर्पित कर चुका हूं देश सेवा ही भगवान की सेवा है यह मानकर ही मैंने तेरी सेवा के माध्यम से भगवान की सेवा की"
नासिक जिले के कलेक्टर जैक्सन की हत्या के आरोप में नासिक षड्यंत्र कांड के अंतर्गत इन्हें 7 अप्रैल 1911 को काला पानी की सजा सुनाई गई और भारत से दूर अंडमान की सेलुलर जेल में रखा गया। वीर सावरकर के अनुसार कैदियों को नारियल चीरकर उसमें से तेल निकलवाना पड़ता था। पहाड़ी को रातों को समतल करना पड़ता है रुकने पर कोड़ो से पिटाई हुआ करती थी।  उन्हें भरपेट खाना नहीं दिया जाता था वीर सावरकर 5 जुलाई 1911 से 21 मई 1921 तक पोर्ट ब्लेयर अंडमान की जेल रहे ।
उन्होंने ब्रिटिश सरकार को कई माफीनामा लिखें जो कि आज उनकी आलोचना का कारण बनते हैं Congress, समेत कई राजनैतिक पार्टियों का यह मानना है उन्होंने  अंग्रेजी सरकार के सामने घुटने टेक दिए थे।
1920 में सरदार वल्लभभाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक के कहने पर ब्रिटिश कानून ना तोड़ने और विद्रोह ना करने की शर्त पर उनकी रिहाई हो गई सावरकर  का मानना था कि अंग्रेजी सरकार की शर्तों पर रिहाई जेल में रहने से अच्छा है।उनका मानना था कि वह जेल में रहने से बेहतर भूमिगत रहकर देश के लिए कुछ अच्छा कर सकते हैं जो कि जेल के अंदर करना संभव  नहीं था।
भारतीय हिंदू महासभा अहमदाबाद में हुए 19वे सत्र के अध्यक्ष चुने गए।
महात्मा गांधी की हत्या के बाद वीर सावरकर का नाम भी संलिप्त होने में आया। परन्तु  कुछ समय के बाद ही रिहा कर दिया गया ।
September 1965 में उन्हें तेज ज्वार ने घेर लिया। उनका स्वास्थ्य गिरने लगा 1 फरवरी 1966 को उन्होंने उपवास करने का निर्णय लिया। 26 फरवरी 1966 को मुंबई में भारतीय समय अनुसार प्रातः 10:00 बजे उन्होंने अपने पार्थिव शरीर को छोड़कर परमधाम को प्रस्ताव कर लिया। वह इच्छा मत्यु  समर्थक थे।

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