ज़ामा मस्ज़िद की कॉपी जो पाकिस्तान में स्थित हैं! बादशाही मस्ज़िद लाहौर।

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बादशाही मस्जिद 
पाकिस्तान की वह मस्जिद जिसका डिजाइन दिल्ली की जामा मस्जिद से मिलता-जुलता है 
जी हां दोस्तों हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान के बादशाही मस्जिद की जो कि लाहौर पंजाब पाकिस्तान में स्थित है इस मस्जिद को 1673 में मुगल सम्राट औरंगजेब ने बनवाया था यह मस्जिद मुगल काल के सौंदर्य और सभ्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण है इसमें हिंदू बौद्ध और इस्लामिक आर्किटेक्चर का प्रभाव है यह पाकिस्तान की दूसरी सबसे बड़ी मस्जिद है इसमें एक साथ लगभग 50000 लोग नमाज अदा कर सकते हैं।
इस मस्जिद का आंगन काफी विशाल है । इसका आंगन बलुआ पत्थर पर पंख के डिजाइन ओं को बनाया गया है।
इस मस्जिद का विशाल प्रवेश द्वार पर स्थित है जिस कारण मस्जिद में घुसने के लिए लोगों को लगभग 22 सीढ़ियों को चढ़ना  पड़ता हैइस भव्य मस्जिद के निर्माण की वजह से मुगल साम्राज्य का खजाना काफी कमजोर पड़ चुका था।इस मस्जिद के निर्माण में लगभग 3 वर्षों का समय लगा था इसका निर्माण वर्ष 1671 में प्रारंभ हुआ जिसे वर्ष 1673 तक लाहौर के "गवर्नर मुजफ्फर हुसैन" की देखरेख में पूर्ण कर दिया गया लाहौर के गवर्नर मुजफ्फर हुसैन औरंगजेब के भाई थे।

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बादशाही मस्जिद 
वर्ष 1818 में उन्होंने हुजूरी बाग में मस्जिद के सामने एक संगेमरमर भवन का निर्माण किया यह उनके दर्शकों की आधिकारिक शाही अदालत के रूप में उपयोग किया जाता था1848 में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख प्रशासक शेर सिंह ने उनकी समाधि बनाने के लिए इस मस्जिद के समीप के स्थानों का उपयोग किया थावर्षा 1849 में अंग्रेजों ने लाहौर से सिख साम्राज्य के नियंत्रण को हटाकर अपना शासन जमा लिया जिसके बाद मस्जिद और इसके आसपास के किलो को अंग्रेजों ने अपने सैन्य छावनी यों के रूप में उपयोग किया थाअप्रैल 1919 अमृतसर जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद देशभर के हिंदू मुस्लिम सिख सभी में अंग्रेजो के खिलाफ बगावत के सुर तेज हो गई।इस नरसंहार के बाद इस मस्जिद में लगभग 30 से 35000 लोग कट्ठा हुए और वहां पर एक महात्मा गांधी का भाषण भी पढ़ा गया था।

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बादशाही मस्जिद 
 इस मस्जिद में पांच निकासी द्वार हैं , तीन संगमरमर के बड़े गुम्मद  और दो छोटे गुम्मद  सम्मिलित हैं इस मस्जिद की कुल मीनरो  की संख्या आठ है जिसमें चार बड़ी मीनारे  हैं जिनकी ऊंचाई 196 फोटो है और 4 छोटी है जिनकी ऊंचाई लगभग 67 फुट ह


सिख आर्मी के प्रसिद्ध शासक रणजीत सिंह ने जुलाई 1799 ईस्वी में इस मस्जिद पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया था और इस मस्जिद का उपयोग अपने घोड़ों और इसके अध्ययन कक्षा का उपयोग करने के लिए और सैनिकों के आवास के लिए प्रयोग किया

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